Saturday, 17 June 2017

राजा खानदान (मैथिली कथा)

बात २००८ ईसवी के अछि। एक बेर हम अपन पिसियौत भैया-भौजी संगे दरिभंगा घुमय के योजना बनेलौं। भोरगरे उठि क नहा-सोना कऽ तीनु गोटे टेंपू से दरिभंगा के लेल बिदा भ गेलहुं। ओतय पहुंचि क सर्वप्रथम श्यामा माई के दर्शन केलहुं । श्रद्धालु हमर आ गृहणी भौजी के मोन दर्शन में भाव विभोर भ रहल छल, मुदा कामरेड भैया के ओहि दर्शन में दार्शनिक तेज प्रज्वलित भ गेल छलैन। ओतय से निकलला पर बाट में ओ बजलाह जे ईह, ऐ मंदिर प्रांगण के वातावरण बड्ड पवित्र अछि मुदा बुजह जे इहो जे छह से सामंतवादऽक प्रतीक छह। हम पुछलियैन जे से कोना यौ भायजी?
भायजी बजलाह जे देखह ई मंदिर जे अछि से महराज रामेश्वर सिंहऽक चिता पर बनायल गेल अछि। “हमर चितो पर लोक पूजा अर्चना करय” ई सामंती सोच नै अछि त की अछि?

हम बजलहुं जे ईह! अहुं भायजी कहां के लिक कहां भिडा दैत छी। ऐ पर भायजी बजलाह हौ हम ठीके कहैत छियह। एतबे में भौजी प्रांगण के सभटा छोट-नमहर मंदिर, गाछ-वृक्ष आदि के पूजा क के आबि गेलिह आ बजलिह जे आब चलै चलू आगा। हमरा श्यामा माई के प्रसाद ’लड्डू’ बड्ड पसिन्द छल हम बजलहुं जे भौजी प्रसाद त द दिय ने। तै पर ओ बजलिह जे एह एतेक दूर सपैर कऽ एलहुं अछि त सभटा मंदीर में पूजा-पाठ केला के बादे खायब। ऐ पर हम की बजितहुं जे आधाटा लड्डू त हम पंडितजी से मांगि क पहिनेहे खा नेने छी! चुपे रहय में भलाई बुझलहुं आ सभ गोटे आगा बढि गेलहुं । आगा मनोकामना मंदिर में पूजा करैत, लक्ष्मिश्वर निवास(संस्कृत विश्वविद्यालय), नरगौना पैलेस, मिथिला विश्वविद्यालय के कैंपस घुमैत, फ़ोटो खिंचबैत दरभंगा महराजऽक किला पहुंचलहुं जहां से आगा बढैत कंकाली मंदिर प्रांगण में जा पहुंचलहुं ।

ओतय श्यामा माई मंदिर प्रांगण सन चहल पहल नै छल, मुदा वातावरण ओतुको दिव्य बुझना गेल छल। एकटा छोट-छिन दोकान पर दू टा छैंडा प्रसाद बेच रहल छल । प्रसाद किनला के बाद मंदिर में ढुकलहुं त देखल जे मंदिर में त केयौ अछिए नै। तखने हमर नजैर एकटा पुरूष पर पडल, जिनकर उमैर गोटैक पचपन बरख हेतैन । गंजी-धोती पहिरने, माथ पर चानन ठोप, गौर वर्ण पर आर शोभा बढा रहल छलैन। गंजी-धोती कतौ-कतौ खोंचायल सन छल मुदा उज्जर बग-बग छल। हम पुछलियैन जे की यौ महराज अहिं पंडित जी छी ? ओ बजलाह जे छी त हमहुं पंडिते मुदा ऐ मंदिर के पुजारी नै छी । हम अपस्यांत हौइत बजलहुं जे की भ गेलै त। छी त अहां पंडिते ने से कनि हमरा सब के प्रसाद चढाब के अछि से अहां चढा ने दियौ।

ऐ पर ओ बजलाह जे बौआ चढा त हमहुं सकै छी मुदा “ककरो हक नै मारबाऽक चाही”। हमहुं राजे खानदान के छी, ऐ मंदिर के सेवा करैत एलहुं अछि। अहां सब पांच मिनट बैसै जाउ पुजारी जी आबि जेताह ।

बैसे के त पड.बे करितै, हम सब बैसियो गेलहुं, मुदा आसू भायजी त विशुद्ध पंचोभिया ब्राम्हण छलाह, गोटगर टीक-ठोप बला। ओ ओय ब्राम्हणदेव से शास्त्रार्थऽक मुद्रा में बजलाह जे औ जी अहां कोन राजा खानदानऽक छी । औइनवारि वंश के छि आ की खंडवाला वंश के छी। ओ बजलाह जे हम राजा महेश ठाकुरऽक वंशज छी। मुदा आसू भायजी एतबे से कहां मानय बला छलाह। ओ यक्ष जेना सवाल पर सवाल करैत गेलाह आ ओ ब्राम्हणदेव युधिष्ठिर जेना सभटा सवालऽक यथोचित जवाब दैत गेलाह। ऐ तरहे लगभग आधा-पौन घंटा बीत गेल छल। अंततोगत्वा आसू भायजी हुनका से बजलाह जे अच्छा चलू राजा महेश ठाकुरऽक खानदान के वंशावली बताउ त। ओ पंडितजी, रटाओल सुग्गा जेना धुरझार बाजय लगलाह राजा महेश ठाकुर, राजा गोपाल ठाकुर, राजा परमानंद ठाकुर, राजा सुभंकर ठाकुर, राजा पुरषोत्तम ठाकुर, नारायण ठाकुर, सुन्दर ठाकुर, महिनाथ ठाकुर, निरपत ठाकुर, रघु सिंह, बिष्णु सिंह, नरेन्द्र सिंह, प्रताप सिंह, माधो सिंह, छत्र सिंह बहादुर, रुद्र सिंह बहादुर, महेश्वर सिंह बहादुर, लक्षमेश्वर सिंह बहादुर, रामेश्वर सिंह, कामेश्वर सिंह................एक स्वरे ई नाम-पाठ सुनि क हमरा नजैर के सामने ओ वंशव×क्षऽक चित्र नाचै लागल जे हम दरिभंगा के म्युजियम में एकबेर देखने रहि।

ऐ उत्तर के सुनला के बाद आसू भायजी ठीक ओहिना आस्वस्त भेलाह जेना अर्जुन के द्वारा अपन दसो टा नाम बतौला पर ’उत्तर’ विश्वस्त भेल छलाह जे किन्नर वेशधारी हुनकर सारथी आन केयौ ने ’अर्जुने’ थिकाह।

एही बीच में घंटी डोलबैत संठी सन कायाबला पुजारीजी सेहो आबि गेल छलाह। हम सब भगवती के दर्शन केलहुं, भौजी पूजा केलिह आ पुजारीजी प्रसाद चढौलाह, दान-दक्षिणा दैत हम सब ओत से विदा भेलहुं आ कि पाछां से ओ ब्रामणश्रेष्ठ टोकलाह जे “हे बाउ, हमरो किछु देने जाउ, दू दिन से हम भोजन नै केलहुं अछि”।



ऐ पर हम कनि विस्मयित भेल छलहुं। ता भौजी प्रसाद बला डिब्बा से ४ टा लड्डू निकालि क हुनका हाथ में थम्हा देलखिन आ हमहु अपन पर्स से एकटा दसटकिया निकालि कऽ हुनका हाथ के थम्हा देलियैन। ऐ के बाद ओ हमरा सब के खूब रास आशीर्वाद दैत विदा केलाह। ओतय से विदा होइत हमरा मोन मे दू टा बात गूंज लागल छल – “हमहु राजे खानदान के छी”, “ककरो हक नै मार्ऽ के चाही” ।

Wednesday, 17 May 2017

सुखैत पोखैर प्यासल गाम!

एहि बेर गाम में एकटा भातिजऽक उपनेन छल आ आफ़िस में सेहो ३-४ टा छुट्टी लगातार भेट रहल छल । बस फ़ेर की एकबैगे गाम जेबा क प्लान बनि गेल । प्लानो तेहन जे जूर-शीतल दिन सांझ तक गाम पहुंचितौं। मगध एक्स्प्रेस अपन आद्त अनुसार चारि घंटा बिलंब सं पटना पहुंचेलक । आब ओत से बरौनी के ट्रेन पकरबाक छल । गर्मी के दिन में सूर्यास्त किछ बिलंबे स होइ अछि, स्वाइत राजेन्द्र पूल पर जखन लगभग साढे छ: बजे पहुंचल छलहुं त सूर्यास्त क मनोरम दृश्य  दृष्टिगोचर भेल छल। ओई मनोरम छटा मे ३-४ टा छौंरा सब गंगा जी के बीच धार में चुभैक रह्ल छल। ई दृश्य देखय बला छल। मुदा इ कि! अचानक से ध्यान गेल जे गंगाजी त सूखि के आधा भ गेलिह आ पाईन क धार केवल पांजर धरि में बचल छल । आब ई स्थिति भयावह बुझना गेल। त एकर की मतलब जे सुखार अपनो गाम-घर दिस दस्तक द देने अछि ! जखन गाम पहुंचलौं त जूर-शीतलऽक कोनो नामो-निशान नै देखना गेल। यद्यपि गाम हम अन्हार भेला के बादे पहुंचल छलहुं ।

अगिला दिन भोरे भोर गाम दिस बिदा भेलहुं, बाट में भेंटनाहर लोक सब सं दुआ-सलामी लैत नदी कात पहुंचलहुं । मुदा देखै छी त ई की; नदी त अछिए नै! गामक बलान नदी सुखि क पीच रोड बनल अछि आ साइकिल, मोटरसाईकिल सभ ओई बाटे सरसरायल ऐ पार से ओइ पार भ रहल अछि। ध्यान गेल जे गामऽक मुखिया (जेकर जनेर-धैंचा के फ़सल नदी कात में लहलहायत छल) के अतिक्रमणक सीमा आउर अधिक बढि गेल अछि आ जत हरदम नदी के धार रहै छल तत्तौ मुखिया के फ़सल लागल छल। ओना फ़सलऽक हालत सेहो पिलपिल सन भेल छल । गाम सं नदी बिला जेनाइ मने कि जे मानु जेना कोनो सौभाग्यवती के सिहुंथ से सेनूर पोछि देनाई भेल!

मानै छी जे हम बेसी दिन गाम नै रहलहुं अछि, मुदा जतबे दिन रहलहुं अछि, ई नदी से एकटा लगाव रहल अछि। बाल्यावस्था में नदी नहाय के अपन उत्साह होय छ्ल, मां के मनो केला पर कहां मानै छलियै। आ गर्मी महिना में त बुझू जे जखने मोन होय तखने चैल दिय नहाय लेल, कोनो अंगा-गंजी लेबा के काजे नै, बस ककरो सं गमछा मांगू आ कूदि जाउ। जा कनि काल नदि में चुभकि ततबे काल में नदि कात के भांईटऽक गाछ पर पसरल गंजी-जंघिया सभ सुखि जाय छल । हं ई बात के अफ़सोस रहत जे हम हेलनाई नै सीख पेलहुं। यद्यपि गामक भैयारी सब थोरे-बहुत सीखेने छल मुदा कालांतर में सेहो बिसरि गेलहुं। ओना गाम-घर में धिया-पुता के दुपहर काल में नदी कात जाय लेल मना करल जाय छल, जै के लेल भूत सं ल के पंडूब्बी तक के डर देखायल जाय छल। नदी किनार में ओना माछ आ डोका पकरय के सेहो अनुभव रहल अछि। ऐ मामला में मीता भाईजी बड्ड तेज छलाह। बुझु से बंसी आ बोर के असल खेलाडी वैह छलाह आ हम सभ त स्टेपनी टाइप में संग लागल रहै छलहुं ।

खैर छोडू, हमहुं कहां पहुंच गेलहुं। हलुमान चौक पर पहुंचलहु त देखै छी जे छौंरा सभ के चौकडी जमल अछि। मीता भायजी सेहो छलाह। हम कहलियैन जे यौ मीता भायजी इ त जुलुम भ गेल। ओ सशंकित होइत बजलाह – जे से की? की भ गेलय? हम प्रतिउत्तर में बजलहुं जे "महराज गामऽक नदी बिला गेल आ अहां पुछै छी जे की भेल!" मुदा हुनकर रिस्पांस बड्ड सर्द छल। ओ बजलाह जे ई सब भगवानऽक माया अछि। देश-दुनिया में पाप बढि रहल अछि, तेकर दुष्परिणाम त एहने ने हेतै हौ। हम बजलहुं जे भायजी, तैयो गमैया के त अपन कर्तव्य करबाक चाही ने नदी के बचाब के लेल। सालों-साल नदी के तह गाद से भरि क उपर भेल जाय अछि, तै पर से नदी तट पर मुखिया के अतिक्रमण बढल जाय अछि। आई नदी सुईख गेल, सोचु जे ऐ संगे कतेको जलिय जीव सभ के त समूले नष्ट भ गेल हैत। क्षेत्रऽक जमीन में पानिऽक लेवल भी नीच्चां खसि परल हैतैक…हं, से त सत्ते. पहिने पचासे फ़ीट पर कल गडा जाय छल मुदा आब सै फ़ीट से कम में कहां नीक पाईन अबै छै – बीच में बात कटैत कनकिरबा बाजल । हम बात के आगा बढबैत बजलहुं जे देखु ई नदी में लोक सब नहाइ जाय छल माल-जाल के नहब आ पाईन पियाब लेल नदी ल जाय छल, मौगमेहर सब कपडा-लत्ता सभ टा त नदिये मे करै जाय छल ने यौ। त जै नदी सं एतेक उपकार भेटै अछि ओकरा लेल किछ त चिंतित होयबाक चाहि ने। एना जे नदी के भूमि के अतिक्रमण होयत रहतै, त निश्चिते ने नदी बिला जायत।

औ जी अहां शहर से आयल छि, ऐश-मौज में रहै छी तैं इ आदर्शवादी गप्प सब फ़ुरा रहल अछि। दिल्ली से ऐनिहार सब के एहिना गोल-गोल गप्प फ़ुराईत रहै छै। – ऐ बेर बीच में बात काटैत बंठाबबाजी बाजल ।

हम कनि व्यथित होयत कहलहुं जे हं शायद अहां ठीके कहै छि, हम पतित भेलहुं जे गामऽक चिन्ता केलहुं । ई गाम त जेना हमर अछिए नै। आ अहां कि जनै छि शहरऽक जिनगी के विषय में । पाईनऽक किल्लत आ ओकर मोल की होई अछि ई कोनो दिल्ली-बंबई बला से बढिया के बुझि सकै अछि! कालोनी सब में पाईन के लऽ कऽ झगडा-झंझट त डेली के खिस्सा रहै अछि, बात त मरै-मारय तक पहुंच जाय अछि। बडका कोठी आ फ़्लैट में रहऽ बला लोक सभ के सेहो सभ सुविधा त भेटै अछि मुदा पाईन हुनको नापि-जोखि क भेटै अछि आ ओकर बड्ड मोल चुकबय परै अछि। जे स्थिति अखन हम-गाम गमय दिस देख रहल छि, जौं लोक नै चेतल त भविष्य में एतुको स्थिति वैह  होबय वाला अछि।

खैर किछ काल गप्प-सरक्का मारलाक बाद हम गाम पर पहुंचलहुं आ नहाय के लेल बौआजी ईनार दिस बिदा होबैये बला छलहुं कि मां टोकलक जे कले पर नहा ले, बौआजी ईनारऽक पाईन कदुआह भ गेल छै। ओह! एकटा आउर अफ़सोचऽक गप्प। जहिया से हमर नदी नहेनाय छुटल छल गाम में हम बौआजीए ईनार पर नहाइत एलहुं अछि। बड्ड पवित्र आ शीतल पाईन होय छल ओहि ईनार के। गर्मी के  दूबज्जी दुपहरियो में एकदम शीतल पाईन। हमरा याद अछि जे बचपन में देखै छलहुं जे जूरशीतल दिन गौआं लोक सभ एकट्ठा भ के एहि ईनारऽक सफ़ाई करै छल, ढेकुल कसाई छल, नब रस्सी बान्हल जाय छल। रामनन्दन पंडितजी यजमानी में भेंटल एकटा नबका डोल बान्है छलाह। माने बच्चो सभ के लेल ई उत्सव के माहौल होय छल । मुदा आब…..!

गामऽक दोकान में आब कोल्ड-ड्रिंक संगे मिनरल वाटरऽक बोतल सेहो बिकाय लागल छल। किछु सम̨द्ध लोक के घर में २० लिटरा आरो-पाईनऽक बोतल सेहो किनाय लागल छल।

भोज-भात में अक्सरहां कोनो छोट बच्चा जेकरा परसऽ के शौक होई अछि मुदा ओकरा लुरिगर नै बुझल जाय अछि के पाईन परसय लेल द देल जाय अछि। कुम्हरम के भोज काल में गुरकेलवा पाईन परसै छल। हम टोन दैत बजलहुं – कि रे गुरकेलवा! तों पाईने परसै छैं । ओ बाजल- ईह भायजी ! सबसं महरग चीज त हमही परसै छी।
- से कोना रौ? हम पुछलियै
ओ बाजल जे भाईजी, भोजन त कतौ भेट जायत मुदा ई गर्मी में सभसं सोंहतगर चीज त ठंढा पाईने लगै छै यौ। गामऽक आधा कल त सुखा गेल अछि आ ईनार-नदी सब के हाल त अहां देखनेहे हेबै। तखन अहिं कहु जे हम की गलत बजलहुं?
एतनी गो गुरकेलवा एकटा गंभीर बात के बड्ड विनोदी भाव में बाजि गेल छल ।

पता लागल छल जे गामक चौधरी सरकार से सस्ता लोन ल के एकटा पोखैर खुनेला हन । हमरा प्रसन्नता भेल जे चलु नीके अछि जे एकटा पोखैर भेने किछ त राहत अछि आ ताजा माछ खाय लेल सेहो भेट जायत । मुदा मां से जखन चर्चा केलहुं त ओ बाजल जे एंह । ओ पोखैर में किछु अछियो! ओ त बहु पंचायत सदस्यऽक चुनाव जितलैन त जोगार से लोन पास करा लेलाह। बैंक के देखाब लेल खाईध खुना के मांईट सेहो बेच लेलाह आ लोनऽक पाई सूईद पर चढा क सूईद खा रहल छैथ। हम कहलहुं देखु त धंधा। सोझ रस्ता पर चलि क कियौ पाई कमाइये नै चाहै अछि, जै से लोक संगे समाजऽक सेहो भला होय।

बहिन एत गेलहुं त ओतौ वैह हाल देखय लेल भेंटल। कहियो ओकर गाम एहि बात लेल नामी छल जे ओई गाम में बहत्तर टा पोखैर। आगा-पाछां, एम्हर-ओम्हर जेम्हरे मुडी घुमाउ तेम्हरे छोट-पैघ पोखैर-डाबर देखाय परै छल। मुदा देखलौ जे ऐ बेर ओइ में स कतेको पोखैर-डाबर भैस गेल छल । बचलाहो में से बहुते रास जीर्ण अवस्था में छल। भाईजी(बहिन के भैंसुर) के बुझल छल जे हम माछऽक प्रेमी आदमी छी। जै बेर बहिन ओत जाय छलहुं, ओ कोनो ने कोनो पोखैर से माछ ल आबै छलाह । बेरूपहर जखन  भाईजी सकरी जाय लेल विदा भेलाह  हम पुछलियै जे भाईजी कतऽ जा रहल छी। बजलाह जे अबै छी सकरी से माछ नेने। हम बजलहुं जे किए गाम में ऐ बेर उपलब्ध नै अछि की? ओ बजलाह जे ओह! गामऽक पोखैर सब सुखल जा रहल अछि। आई-काइल्ह कतौ मछहर कहां भ रहल अछि। तैं ऐ बेर अहां के सकरीए के माछ खोआबै छी।

हमर एकटा मधुबनी के मित्र सं सूचना भेटल जे शहरऽक आस पास जे डाबर-पोखैर सभ छल जै में से कतेको में शहरऽक नाला सेहो बहै छल, ओकरा सभ के मुईन क ओय जगह पर मकान-दोकान सभ बनाओल जा रहल अछि। जै कारण भूजल स्तर में गिरावट के संगहि शहर में जलऽक निकासी के सेहो समस्या भ रहल अछि।

वापस घुरै काल ट्रैन में जखन एकटा महिला के पंद्रह टाका एमआरपी बला पाईनऽक बोतल के बीस टाका में बेचै बला भेंडर से ऐ बात के लेल जिरह करैत देखलहुं त इ बात सब एक-एक कय के मोन परै लागल। हम सोचै लगलहुं जे अपन देश में जे हजारो-हजार के संख्या में पोखैर-डाबर-दिग्घी सब छल या अछि से अचानक से त नै प्रकट भ गेल हेतै। एकर पाछां निश्चिते जौं बनबाब बला के इकाई छल हैत त बनाब बला सभ के दहाई छल हैत। आ ई ईकाई-दहाई सभ मिल क सैंकडा-हजार बैन गेल हेतै। पिछला किछु दस-बीस साल में विकासऽक नया पाठ पैढ गेल समाज ऐ इकाई, दहाई, सैंकडा, हजार के सोझे शून्य में पहुंचाब के काज कय रहल अछि। ऐ विरासत के सम्हार के चिंता नै समाज के भ रहल अछि आ नै सरकार के । आ जौं कतौ भऽओ रहल अछि त सरकार आ समाज में सामन्जस्ये नै बैस रहल अछि। हम इहो सोचय लगलहुं जे  जौं जिनगी में भगवती अवसर आ सामर्थ्य देलखिन त गाम में पांच कट्ठा जमीन कीन क ओतय एकटा पोखैर खुनायब आ ओहि में माछ पोसब। आब ट्रेनक गति संगे हम  यैह सभ योजनाऽक खाका खीच रहल छी।
 बस एतबे छल ई खिस्सा ।

Tuesday, 11 April 2017

अरजल जमीन (मैथिली कथा )

"की भेल यौ, कोनो निदान भेटल कि नै?" लालकाकी लालकक्का के दुआरि पर कपार धऽ कऽ बैसल देख के बजलिह।

कहां कोनो बात बनल, ओ त  अडल अछि जे नै अहांक के त पाई देबैये पड़त नै त ई जमीन हम आन ककरो हाथे बेच देब आ अहां के बेदखल होबय पड़त।

आ पंच सब कि बाजल? 
पंच सभ की बाजत, कहै ये जे अहां लग पाई देबाक कोनो सबूत नै अछि , नै अहां के नाम सं जमीन लिखायल गेल अछि त इ बात कोना मानल जाय जे अहां ई पांच कट्ठा जमीन कीनने छि! बेस त किछ बीच के रस्ता निकालल जा सकै अछि । आब देखियौ जे काइल्ह कि फ़ैसला होई अछि।

बात इ छल जे करीब पच्चीस-तीस बरष पहिने लालकक्का अपन्न मेहनत आ श्रम के कमाई सं पांच कट्ठा घरारी के जमीन गामक जमीनदार ’सेठजी’ से कीनने छलाह । ओइ टाइम में जवान जुआन छलाह, कलकत्ता के एकटा मील में नौकरी करै छलाह, किछु पाई भेलैन त माय कहलखिन जे एकटा घरारी के जमीन कीन ले। बेस त किछु जमा कैल आ किछु ईपीएफ़ के पाई निकाईल के इ सेठजी से पांच कट्ठा घरारी के जमीन कीन नेने छलाह. मुदा भांगट एतबे रहि गेल छल जे ओ जमाना शुद्धा लोक सभ के जमाना छल, लिखा-परही, कागज-पत्तर गाम घर में कहां होई छल ओइ टाईम में ! बस मुंहक आश्वासन चलै छल । से लालकक्का के इ घरारी के दखल त भेंट गेल छल मुदा जमीन के रजिस्ट्री नै भेल छल। इ गप्प सब लालकाकी के बुझलो नै छल। के ओई जमाना में इ गप सब अपन नबकनियां के बतबै छल! बेस लालकक्का धीरे-धीरे ओय बंसबिट्टी के उपटेलाह, आ किछेक साल में एकटा छोट छिन पक्का के घर बना लेलाह. ओई टाईम में गाम में गोटैके घर पक्का के बनल छल, तखन लालकक्का के नाम सेहो बजै छल गाम में । बाद में जुआनी गेलैन आ काजो छुटलैन, आ ओ गाम धेलाह। गाम में कोनो बेसी खेत पथार त छलैन ने जे ओहि में लागल रहितैथ, तखन कोहुना समय कैटिये रहल छल ।ओना लालकक्का के इ व्यक्तिगत विचार छल जे लोक  के जीवन में तीन टा कर्म पूरा करबा के रहै अछि – घर बनेनाई, बेटी बियाह आ बेटा के अपन पैर पर ठारह रहै योग्य बनेनाई । से लाल कक्का इ तीनो काज सं निश्चिंत भ गेल छलाह आ कखनो गाम में त कखनो बेटा लग में जीवन बिताबय लगलाह। 

मुदा किछु दिन पहिने एकटा एहन बम फ़ूटल जै कारणे लालकक्का के अपन अरजल घरारी हाथ सं निकलैत बुझना गेलैन । जेना होमय लगलैन जे जीवन में किछु नै केलहुं। बात इ भेल छल जे अचानके से गाम में बात ई उठल  जे हिनकर घरारी के जमीन त हिनका नाम पर अछिए नै। सेठजी के मुईला उपरांत इ जमीन हुनकर बडका बेटा के नाम पर चढा देल गेल छल आ आई सेठजी के मुईला के कतेक बरष उपरांत जमीनदारजी इ जमीन ककरो आन के बेचय के बात कय रहल छलाह। लालकक्का के जखन ई खबर दलालबौआ द्वारा लगलैन ओ जमीनदारजी लग जाय कहलखिन जे औ जमीनदारजी! ई कि अन्याय करै छि। इ घरारी हम अहांक बाबूजी से किनने छलहुं चारि हजार कट्ठा के भाव से बीस हजार रूपया में से अहुं के बुझल अछि, अहां के सामने पैसा गिन के देने छलहुं। कतेको बरष से एहि घरारी पर घर बना के वास कय रहल छि, से ओय समय में त लीखा परही भेल नै छल, आब अहां करै चाहै छि त इ जमीन हमरा नामे लिखियौ। इ बात पर जमीनदारजी भौं चढा के बजलाह जे देखू अहां दूइए कट्टा के पाई देने रही आ बांकि के तीन कट्टा में एहिना बास क रहल छी, से जौं यदि अहां सभटा जमीन लिखबऽ चाहै छि त लाख रूपए कट्ठा के दर से तीन लाख टाका लागत आ नै जौं अहां लग पांच कट्ठा जमीन कीनय के कोनो सबूत अछि त से बताबु। एतेक घुड़की लालकक्का सन शुद्धा लोक के विचलित करय लेल बहुत छल । तथापि ओ हिम्मत कऽ के बजलाह जे यौ श्रीमान एना कोना अहां बाजि रहल छि अहांके सामनेहे हम अहां बाबू से ई जमीन कीनने छलहुं आ कतेको बरष सं एतय रहै छि, आई सं पहिने त अहां किछु नै बजलहुं । बीच में दलालबौआ बजलाह जे  कक्का अहां लग लेन-देन के कोनो सबूत कोनो कागज ऐछ कि? यदि नै अछि त फ़ेर त पंचैति करा क जे निर्णय होय अछि से स्वीकार करय परत अन्यथा अहां के ओइ जमीन से बेदखल होबय परत ।

काल्हि भेने पंचैति बैसल – पंचैति कि बुझु, दलालबौआ, जमीदारबाबू, आ दू-चारि टा लगुआ-भगुआ । पंचैति में जमीनदारबाबू तीन लाख टका के मांग रखलैथ, लालकक्का सेहो अपन पक्ष रखलैथ। अंतत: ई निर्णय भेल जे लाल कक्का या त दू कट्ठा जमीन जै पर घर बनल अछि से सोझा जमीनदारबाबू से लिखा लियैथ आ नै जौं पांचो कट्ठा के घरारी चाहिएन त डेढ लाख टाका (जमीनदारबाबू द्वारा प्रस्तावित मूल्य के आधा) जमीनदारबाबू के देबय परतैन ।

लालकक्का कहियो सपनो में नै सोचने छलाह जे हुनका संगे एहनो कपट भ सकै अछि । मुदा आब कोनो चारा नै रहि गेल छल । बेटा के जौं इ बात कहलखिन त ओकर रिस्पोंस ठंढा छल. पहिने त अफ़सोच केलक जे बाबूजी अहां आई धरि ई बात नै मां लग बजने छलहु नै हमरा सभ लग। फ़ेर कहलक जे दूइए कट्ठा लिखा ने लिय, घरारी ल के की करब, हमरो सभ के कियौ  गाम में नै रह दै चाहै अछि आ साल में किछुए दिन लेल त गाम जाय छी। मुदा लालकक्का के लेल ओ जमीन कोनो धिया-पुता से कम छल की ! अपन पसीना के कमाय से अरजल घरारी। ओ निर्णय केलाह जे डेढ लाख टाका दऽ के पांचो कट्ठा लिखबा लेब। लिखबाय सेहो पचास-साठि  हजार टाका लगिए जाएत। माने जे आब सवाल छल दू लाख टाका के जोगार के । किछु पाई एम्हर-आम्हर से कर्ज लेलैथ । बांकि के लेल बेटा के कहलखिन त ओ कहलक ठीक छै अहां ओकर अकाउंट नं० भेजु हम दस-पन्द्रहदिन मे कतौ से जोगार क के ट्रांसफ़र क दैत छि। लाल कक्का जखन जमीनदारबाबू लग अकाउंट नं० मांगय गेलाह त एकटा नबे ताल शुरू भ गेल । जमीनदारबाबू कहलाह जे पाई त अहांके सभटा नकदे देबय परत से अहां अपना अकाउंट पर मंगबा लिय आ हमरा बैंक से निकालि क दऽ देब।

लाल कक्का सभटा गप्प बेटा के कहलखिन। बेटा कहलक जे नै ई ठीक नै अछि, ओ कैश में पाई ल के ब्लैकमनी बनबै चाहै अछि से अहां मना क दियौ। आ ओनाहुं जौं आइ अहां से पाई ल लेत आ पहिनेहे जेना मुकैर जायत तखन की करबै? से अहां साफ़ कहि दियौ जे जौं पाई बैंक के मार्फ़त लेताह त ठीक नै त हम नकद नै देब।

लालकक्का के  इ बुरहारी में एहन उपद्रव भेल छल दिमाग अहिना सनकल छल, तै पर से अपन अरजल जमीन हाथ से निकलि जाय के डर। तहि लेल शायद हुनका बेटा के इ आदर्शवादी बात निक नै लागल छल। उल्टा-सीधा सोचय लगलाह । भेलैन जे छौंडा  कहिं टारि त नै रहल अछि।

फ़ेर ध्यान पड़लैन अपन एफ़डी दऽ। करीब डेढ लाख हेतै। बड्ड जतन सं जमा क के रखने छलाह। कोनो मनोरथ लेल। पता नै शायद पोता के उपनयन लेल की अपने श्राद्ध लेल आ कि अपना बाद लालकाकी लेल से हुनकर मोने जनैत हेतैन कि लालेलाकी के।
एकाएक निर्णय केलैथ आ लालकाकी के कहलखिन जे एकटा काज करू – पेटी से हमर एफ़डी के कागज सभ निकालू त । लालकाकी उद्देश्य बुझैत कहलखिन जे धैर्य धरू ने, कंटीर कहलक अछि ने जे जमीनदारबाबू के अकाउंट नं० पठा देब लेल ओ पाई भेज देत, से कहै त ओ सहिए अछि कि ने – ईमानदारी के पैसा कमसेकम ईमानदारी से जमीनदरबा के भेटै ने, एकबार फ़ेर जाउ ओकरा से मांगियौ अकाउंट नं०, जौं पाई के ओकरा बेगरता छै त देबे करत ने।
हं! हम भरोसा कऽ के पछताय छी आ आब बेटा ईमानदारी देखा रहल अछि, ओहो पछतायत बाद में। यै, आब सज्जन आ ईमानदार लोक के जुग रहलै अछि! देखलियै नै कोना जमीन लेल दरिभंगा में एकटा के आगि लगा के मारि देलकै। ई लोभी आ बैमान दुनिया के कोनो ठेकान नै। तैं निकालू झट द कागज सब, आईए बैंक भ आबि।

आब एतेक सुनला के बाद लाल काकी की जवाब दऽ सकै छलिह । हुनका लग एतेक गहनो त नै छ्ल जे आवेश दैत कहितथि जे "त बेस इ गहने बेच दिय"। बस चुपचाप पेटी खोलि क कागज निकालै लगलिह।

Tuesday, 21 March 2017

रक्षिता (मैथिली लघु कथा)

आई रक्षिता भारतीय सेना के मेडिकल कोर्प में कमिशंड होबय जा छलिह । ऐ समारोह में हुनकर मां – पप्पा अर्थात रिद्धि आ रोहन सेहो आयल छलाह । रिद्धि के आई अपन बेटी के लेल किछु बेसिए दुलार आ फ़क्र बुझना जा रहल छल । समरोह में कुर्सी पर बैसल बैसल ओ पुरना खयाल में डूबि गेल छलिह ।
जखन पीजी - सुपर स्पेशलिटी के एंट्रेंस में रक्षिता नीक रैंक नेने छलिह तखन रोहन हुनका दिल्ली के एकटा जानल-मानल प्राईवेट मेडिकल इंस्टिच्युशन में प्रवेश लेब लेल कहने छलाह । ओ रक्षिता के बुझा रहल छलाह जे देखह बेटी ओ नामी कॉरपोरेट अस्पताल छै, नीक पाई भेटत, संगहि नाम आ शोहरत सेहो बढत त जिनगी ठाठ से कटत, तहि लेल कहै छि जे आर्मी अस्पताल में प्रवेश लेबय के जिद्द जुनि करू। ओतय अहां सं पहिनेहे बॉण्ड भरायल जायत आ पोस्ट डोक्टोरल (सुपर-स्पेशलटी) करय के बाद अहां के कैएक साल धरि सेना में जिवन घस पडत आ नै त लाखक लाख टका बॉन्ड  भरू ! मुदा रक्षिता कहां मानय वला छलिह, छुटिते ओ बजलिह: अहुं ने पप्पा किछु बाजि दैत छी! हमरा जतेक नीक एक्स्पोजर आ लर्निंग के सुविधा आर्मी अस्पताल में भेंटत ओहन सुविधा अहांक ओ कॉरपोरेट  अस्पताल में कतय सं भेटत! आ आर्मी अफ़सर के यूनिफ़ार्म देखने छी पप्पा कतेक चार्मिंग आ मस्त होई अछि ने, आ ओईपर सं आर्मी के रैंक पप्पा – सोचियौ जे डाक्टर के संगहि जौं हमरा कैप्टन , मेजर आ कर्नल रक्षिता रोहन के नाम सं पुकारल जायत त कत्तेक सोंहंतगर लगतै ने । आ अहां! ओना त टीवी डिबेट देख देख क हरदम सेना आ राष्ट्रवाद के जप करैत रहै छी आ आई जखन हम सेना के सेवा करय चाहै छी त अहां हमरा रोकि रहल छी! – इ सब गप्प ओ एक सुर में कहि गेल छलिह।

एत्तेक सब सुनला के बाद कहां रोहन हुनका रोकि सकल छलाह । आ फ़ाईनली ओ आर्मी अस्पताल में डीएनबी-प्लास्टीक सर्जरी प्रोग्राम में प्रवेश ल लेने छलिह। जिद्दीयो त ओ बहुत बडका छलिह । पीजी एडमिशन के टाईम पर सेहो रिद्धि हुनका सं कहने छलिह जे अहां लडकी छी अहि लेल लडकी बला कोनो स्पेशल्टी ल लिय – ओब्स गायनी, रेडियोलोजी या एहने सन कोनो मेडिकल स्पेशिलिटी ल लिय; कत्तौ, कोनो अस्पताल में आराम सं काज भेंट जायत  अ नै त अप्पन क्लिनिक सेहो खोलि सकै छी । फ़ेर विवाह दान भेला के बाद बर संगे एड्जस्ट्मेंट सेहो बनल रहत ।
"बर गेल अंगोर पर । हमरा त प्लास्टिक सर्जन बनै के अछि आ ओकरा लेल हमरा जनरल सर्जरी पढय के हेतै, त हम सर्जरी मे एडमिशन ल रहल छी बस । " – मां के बात के जवाब में ओ इ बात एक सुर में कहि गेल छलिह ।

रक्षिता बाल्यावस्थे सं  होनहार बच्ची छलिह आ एकर श्रेय वास्तव में रोहन के जाइ अछि ।  नेनपने सं ओकरा पढबै के जिम्मेवारी रोहन अपने सम्हारने छलाह ।  १०-१२ घंटा के ड्यूटी के बाद जखन ओ हारल थाकल घर आबै छहाल तखनो ओ  बड्ड लगन सं रक्षिता के बैसा क पढबै छलाह । हुनका पढबै खातिर समय निकालबा के चक्कर में कैएक बेर हुनका ऑफिस  में अपन अधिकारी से सेहो उलझय पडय छल । एहन स्थिति में कै बेर रिद्धि कहने छलिह जे कत्तौ ट्यूशन लगा दियौ, आई-कैल्ह बिना ट्यूशन के कहीं बच्चा पढलकै अछि, मुदा रोहन हुनकर गप्प कहियो नै सुनलाह ।  इंटर में गेला पर इ सब दास सर के संपर्क  में आयल छलाह, जे बड्ड योग्य शिक्षक छलाह, आ दास सर सेहो रक्षिता के पढबै में बहुत मेहनत केने छलाह, जेकर ई परिणाम छल जे रक्षिता एमबीबीएस के लेल सेलेक्ट भ गेल छलिह । जखन ओ दास सर सं गुरूदक्षिणा मांगय कहने छलिह त सर कहने छलाह जे "बेटी चिकित्सा मनुख क सेवा करय वला पेशा अछि, त जतेक भ सकै लोक सभ के सेवा करिह, यैह हमर दक्षिणा होयत । 
याद क पांइख लगा क रिद्धि अतित के गहराई में उतरय लागल छलिह । रोहन के संग हिनकर विवाह क कैएक वर्ष भ गेल छल मुदा हुनका कोनो संतान नै भेल छल । एक दिन अचानके स रोहन एकटा जन्मौटि नेना के कोरा मे नेने आयल छलाह आ ओकरा रिद्धि के कोरा मे राखि देने छलाह आ कहलाह जे "अपन बिटिया रानी"।
"हाय राम! इ केकर बच्चा उठा के नेने एलहु अछि?" रिद्धि रोहन से पुछने छलिह । रोहन उत्तर दैत कहने छलाह जे "हम अनाथालय में एकटा बच्चा लेल आवेदन केने छलहु, आई ओतय स खबर आयल छल जे एकटा जन्मौटी बच्चा के केयौ राइख गेल अछि अनाथालय में यदि आहां देखय चाहै छि त …….।" बस हम ओतय पहुंच गेलहुं आ एत्तेक सुन्नैर नेना के देख क झट हं कहि देलहुं आ सभटा फ़ोर्मलिटि पुरा कय क एकरा अहां लग नेने एलहु अछि।
"मुदा इ ककरो नाजाय बच्चा……"
"हा..हा..हा… बच्चा कोनो नाजायज नै होई अछि, नाजायज त ओकरा समाज बनबै अछि" रिद्धि के बात काटैत रोहन बजने छलाह, आ जवाब बे रिद्धि बस एतबे बजने छलिह जे "अहां एकर रक्षक भेलहु आ इ हमर रक्षिता अछि।"

अतितक गहराई में डूबल रिद्धि के कान में अचानक से रोहन के उ स्वर गूंजय लागल छल, आ हुनकर तन्द्रा तखन टूटल जब हुनका कान में रक्षिता के नाम गूंजल जे रक्षिता के कमिशनिंग आ बैज ओफ़ ओनर के लेल बजाबय लेल पुकारल गेल छल । रिद्धि के आंखि सं मोती जेका नोर टपकय लागल छल, कियेकि आई हुनकर बेटी एकटा आर्मी अफ़सर का एकटा कुशल प्लास्टिक सर्जन जे बनि गेल छलिह।

Saturday, 18 March 2017

बात बिहार में आधुनिक चिकित्सा शिक्षा-व्यवस्था के स्थिति की:

बिहार में पटना मेडिकल कॉलेज के अलावा दरभंगा  मेडिकल कॉलेज की स्थापना भी आजादी से पहले अर्थात 1946  में की जा चुकी थी । वर्तमान में राज्य में एम्स पटना सहित कुल 14 संस्थान हैं जहां एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लगभग 1450 सीट उपलब्ध हैं अर्थात लगभग सत्तर हजार की जनसंख्या पर एक सीट।

इन 14 संस्थानों मे से दो की स्थापना जहां आजादी से पहले हो चुकी थी वहीं 12 मे से 5 (42%) की स्थापना पिछले दस वर्षों में नीतिश कुमार के शासन काल में हुई है। यद्यपि यह संख्या अपने आप मे अपर्याप्त है, और इन पांच में से एक(एम्स), भारत सरकार की संस्था है (जिसे पूर्व प्रधानमंत्री पं० अटल बिहारी बाजपेयी की देन कहा जाए), दो ट्रस्ट के अस्पताल हैं और अन्य दो, राज्य सरकार के अस्पताल । इनमे से बेतिया मेडिकल कालेज में छात्रों के लिए मूलभूत (मशीन और लैब) सुविधाओं के कमी की पोल-पट्टी कुछ माह पूर्व ही रवीश कुमार ने प्राईम टाइम में खोली थी ।

मीडिया के माध्यम से पता चला है कि राज्य सरकार, राज्य के पांच जिलों जिसमें बेगूसराय (मेरा ग̨ह जिला) और मधुबनी(जहां मेरा बचपन बीता है) भी शामिल है, में पांच नये मेडिकल कालेज खोलने वाली है और इसके लिए दो हजार करोड रूपए की मंजूरी दे दी गई है, यद्यपि इस विषय में राज्य सरकार से जानने की कोशिश की तो कोई जवाब नही मिला है ।

अब आते हैं बांकि के सात संस्थान पर, तो आजादी के बाद के 60 वर्षों में मेडिकल शिक्षा में राज्य सरकारों की यही उपलब्धि रही है! और इसमे भी लालू यादव के 15 वर्षॊं के राज को देखें तो उस दौरान एक भी संस्थान की स्थापना नहीं हुई। वैसे वर्तमान में उन्ही के पुत्र राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन के बैठे हैं; अत: उनके पास भी मौका है अपने माता-पिता के कर्महीनता (अथवा कहें की पाप) का प्रायश्चित राज्य में स्वास्थ्य शिक्षा व्यवस्था का विकास कर करें ।

राज्य के 14 संस्थानों में नौ राज्य सरकार के, एक केंद्र सरकार का एवं चार ट्रस्ट के संस्था हैं। मजेदार बात यह है कि राज्य में एक भी पूर्णत: निजी चिकित्सा संस्थान नहीं है (जिसके अपने नफ़ा-नुकसान है, जिसकी विवेचना फ़िर कभी), जैसा कि अन्य राज्यों मे देखने को मिलता है ।

राज्य में केवल पीएमसीएच और एम्स पटना ही ऐसी संस्थान है जहां एमबीबीएस की सौ से ज्यादा सीटें हैं ।

वर्तमान में जहां राज्य में करीब 1450 एमबीबीएस की सीटें है (जो कि स्वयं अपर्याप्त है) वहीं इसके मुकाबले स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की कुल 525 के लगभग सीटे हैं (डिप्लोमा/एमडी/ एमएस/डीएम/ऎमसीएच/डीएनबी सब मिलाकर के) जो की एमबीबीएस के सीटों के आधी से भी कम हैं । अर्थात राज्य में एमबीबीएस करने वाले आधे से अधिक चिकित्सक या तो स्नातकोत्तर विशेषज्ञता हासिल नहीं कर पाते या फ़िर इसके लिए राज्य से बाहर पलायन कर जाते हैं जो कि राज्य में विशेषज्ञों की कमी का प्रमुख कारण है । यदि आप राज्य के चिकित्सा संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों और राज्य के सरकारी अस्पतालों/ निजी क्लिनिक मे कार्यरत चिकित्सकों के अकादमिक रिकार्ड को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ये शिक्षक अपने ही संस्थान या राज्य के किसी अन्य संस्थान से स्नातकोत्तर हैं वहीं सरकारी अस्पतालो/निजी क्लिनिक में कार्यरत अधिकांश चिकित्सक राज्य के किसी संस्थान से एमबीबीएस या डिप्लोमा हैं जिन्हें स्नातकोत्तर विशेषज्ञता हासिल करने का अवसर नही मिल सका। यह एक स्वाभाविक बात है कि जो कोई भी पढाई के लिए कहीं और जाएगा, निश्चित ही बाद में वह कार्य भी उसी क्षेत्र में करने लगेगा। अत: राज्य में चिकित्सा विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाने के लिए स्नातकोत्तर सीट बढ़ाना आवसश्यक है। जहां एमबीबीएस के लिए पांच नए संस्थान खोलने की घोषणा की गई है वहीं स्नातकोत्तर के सीटों के बढोतरी के लिए सरकार कुछ खास करती दिख नहीं रही है ।

कुल मिला के देखा जाए तो आधुनिक चिकित्सा शिक्षा के व्यवस्था में फ़िलहाल तो राज्य सरकार काफ़ी पिछडी हुई दिख रही है, और इसे एक ठीक-ठाक स्तर तक पहूंचने के लिए अभी काफ़ी कुछ करने की जरूरत है ।

Saturday, 4 March 2017

रक्षिता (कहानी)


आज रक्षिता भारतीय सेना के मेडिकल कॉर्प मे कमिशंड होने जा रही थी । इस समारोह में उसके माता-पिता अर्थात रिद्धि और रोहन भी आए हुए थे । रिद्धि को आज अपने बेटी के लिए ज्यादा ही प्यार और फ़क्र महसूस हो रहा था । समारोह में बैठे-बैठे ही वो पुराने खयालों में खो गई थी ।
जब पीजी-सुपर स्पेसियालिटी के एंट्रेंस में रक्षिता अच्छा रैंक लायी थी तो रोहन ने उसे दिल्ली के एक मशहुर प्राइवेट मेडिकल इन्स्टीच्युशन में प्रवेश लेने को कहा था । वो रक्षिता को समझा रहे थे बेटा कोर्पोरेट हॉस्पिटल  है, अच्छे पैसे मिलेंगे, नाम और शोहरत बढेगी तो लाईफ़ ठाठ से कटेंगे, क्यों आर्मी हॉस्पिटल में एडमिशन लेने का जिद्द कर रही हो; वहां वो तुमसे बोंड भरवाएंगे और पोस्ट-डोक्टोरल के बाद तुम्हे सेना में कई साल घीसने पडेंगे! पर वो कहां माननेवाली थी उसने कहा था आप भी न पापा, कुछ भी हां! केवल पैसा ही तो सबकुछ नहीं होता है न पापा। मुझे जितना बढिया एक्स्पोजर और लर्निग फ़ैसिलिटी आर्मी अस्पताल में मिलेगा वैसा आपके उस कोर्पोरेट अस्पताल में कहां मिलेगा, और आर्मी अफ़सर की युनिफ़ार्म देखी है आपने कितनी चार्मिंग और मस्त होती है न; और उसपर से आर्मी का रैंक पापा – सोचो जब मुझे पुकारा जाएगा कैप्टन, मेजर फ़िर कर्नल रक्षिता रोहन। वॉव! इट्स साऊन्ड प्रिटि एक्साईटींग ना । और आप वैसे तो टीवी डिबेट देख-देखकर  हरवक्त सेना और राष्ट्रवाद का राग अलापते रहते हो और जब मैं सेना की सेवा करना चाह रही हूं तो आप रोक रहे हो। इसलिए प्यारे पापा, मैं आर्मी अस्पताल में ही डीएनबी-प्लास्टिक सर्जरी करुँगी |
इतना सब सुनने के बाद कहां रोहन रोक सका था उसे । जिद्दी भी तो बहुत बडी थी । पीजी एडमिशन के वक्त भी रिद्धि ने उसे कहा था कि लडकी हो, लडकियों वाली कोई स्पेशल्टी ले लो – ओब्स गायनी, रेडियोलोजी या कोई मेडिकल सब्जेक्ट ले लो। किसी भी अस्पताल में काम मिल जायेगा या अपना क्लिनिक चला सकती हो, फ़िर शादी के बाद पति के साथ एडजस्ट्मेंट भी बना रहेगा।
"पति गया तेल लेने, मुझे प्लास्टीक सर्जन बनना है जिसके लिए मुझे जर्नल सर्जरी पढना होगा तो मैं सर्जरी में एडमिशन ले रही हूं बस ।" - मां के बात के उत्तर में उसने ये एक सांस में कहा था ।

रक्षिता बचपन से ही होनहार लडकी थी और इसके लिए रोहन को भी क्रेडिट जाता है, बचपन से ही उसको पढाने की जिम्मेवारी उसने ले रखी थी, १०-१२ घंटे की ड्य्टी के बाद वो हारा थका आता फ़िर भी वो रक्षिता को पढाता था। इसके लिए समय निकालने के लिए कई बार उसे ओफ़िस में बोस से उलझना भी   पडता था, रिद्धि तो कहती थी की ट्यूशन लगा दो कहीं, पर रोहन ने उसकी कभी नही सुनी। ग्यारहवीं में वो दास सर के संपर्क में आये थे, दास सर ने भी उसपर काफ़ी मेहनत किया था जिसका परिणाम था कि रक्षिता एमबीबीएस के लिए सेलेक्ट हो गई थी । उसने दास सर से गुरूदक्षिणा मांगने को कहा था तो सर ने कहा था – बेटा चिकित्सा मानव सेवा का पेशा है तो जितना हो सके मानव सेवा करना यही मेरी दक्षिणा होगी ।

यादों के उडान भरते भरते रिद्धि अतित की गहराईयों में उतरती जा रही थी । रोहन के साथ उसकी शादी को कई वर्ष हो गए थे पर उनके कोई संतान नही हुई थी । एकदिन अचानक रोहन एक नन्ही सी बच्ची को गोद में लिए हुए आया था और उसे रिद्धि के गोद में रख दिया था और कहा था "हमारी बिटिया रानी"। हाय राम ये किसका बच्चा उठा लाए हो जवाब में रिद्धि ने रोहन से पूछा था । रोहन ने जवाब दिया था "मैने अनाथालय में एक बच्चे के लिए अवेदन कर रखा था, आज उनका फ़ोन आया था कि एक नवजात बच्ची कोई रख गया है अनाथालय में यदि आप देखना चाहें तो…।" मै वहा गया तो इतनी प्यारी बच्ची देखकर झट हां कह दी और सारी फ़ोर्मालिटी पुरी कर इसे ले आया तुम्हारे पास।
पर ये किसी की नाजायज बच्चा…………
हा..हा..हा..हा.. बच्चा कोई भी  नाजायज नहीं होते हैं, नाजायज तो उसे समाज बना देती है – रिद्धि की बात बीच में ही काटते हुए रोहन ने कहा था और जवाब में रिद्धि ने बस इतना कहा था "आप इसके रक्षक हैं और ये हमारी रक्षिता" ।

अचानक से रोहन के वो शब्द उसके कानों में गूंजने लगे थे, और उसकी तंद्रा तब टूटी जब उसने सुना की कमिशनिंग और बैच ऑफ़ ऑनर के लिए रक्षिता का नाम पुकारा जा रहा था । उसकी आंखों से आंसूओं के मोती छलक पडे थे, क्योंकि आज उसकी बेटी एक आर्मी अफसर और एक कुशल प्लास्टीक सर्जन जो बन गई थी ।

Monday, 6 February 2017

जनवरी २०१७ माह में लिखे कुछ मुक्तक

हमारे जख्म पर मलकर वो मिर्ची हम से पूछे हैं
बहुत चिंता तुम्हारी है, बता अब हाल कैसे हैं।
सुनाऊँ उनको भी मैं अब, बयाने हाल अपना ये
ईलाही की नजर में तुमसे मेरी औकात उँची है।।

बहुत तंगदिल तुम्हारा है, यही पहचान देते हो
हरेक संगदिल को दुश्मन, तुम अपना मान लेते हो!
कभी ईश्वर जों मिल जाएं, भला पूछेंगे वो तुमसे
हमारे नेक बन्दों को बता क्यों त्राण देते हो !!

सिसक हर एक मेरा तुमसे, यही फ़रियाद करता है
भंवर के बीच में तेरी खुदाई याद करता हूँ |
बनाया है हमें जब नेक,हमें काबिल बना मौला
अता कर शख्सियत वो, जिनको ज़माना याद करता है ||

चलन हो बेवफाई का, वफ़ा को याद करना क्या
जहाँ अंधेरगर्दी हो वहाँ फ़रियाद करना क्या
सुने किस्से बहुत हमने वफाई, दोस्ती के भी
ये बस किस्से कहानी हैं, हकीकत में भला है क्या।|

हरएक करवट में अब गुजरा जमाना याद आता है
लड़कपन तो कभी बचपन हमारा याद आता है
वो रातें जो कभी काटी थी हमने दोस्तों के संग
वो बिछड़े यार और उनका याराना याद आता है।।

कभी बोए थे कुछ पौधे, हमारे खेत में हमने
उन्ही को काटने उनके ही अब रखवार आए हैं।
जताया हक़ अपना भी, जो हमने उनके दानों पर
तो करने बेदखल हमको, मन के बीमार आए हैं !!

थकन है, पीड़ हैं, आँसू हैं और उदासी है
दिलों में जीतने के फिर भी कुछ उम्मीद बाँकि हैं
वतन के नौजवाँ सुन लो , सदाएं तुम मेरे दिल की
हरएक ख्वाहिश मुकम्मल हो यही जज्बात हैं मेरे।

वो दिल में गोडसे, टी-शर्ट पे भगतसिंह नाम लिखते हैं
कभी आंबेडकर, गांधी को खुद की पहचान लिखते हैं
कभी पूछो यदि उनसे, भला ऐसा किया है क्या
बताते कुछ नहीं उल्टे कई इल्जाम लिखते हैं।